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Posted on Feb 10, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems, Nostalgia Poems | 0 comments

पीहर का बिरवा – अमरनाथ श्रीवास्तव

पीहर का बिरवा – अमरनाथ श्रीवास्तव

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A married daughter full of pleasant memories of a carefree childhood returns after a long time to her parent’s village home. Contrary to her mental image, she finds that the house is now full of tensions, ego clashes and frictions… Here is a touching poem by Amarnath Shrivastava – Rajiv Krishna Saxena

पीहर का बिरवा
छतनार क्या हुआ
सोच रहीं लौटी
ससुराल से बुआ।

भाई भाई फरीक
पैरवी भतीजों की
मिलते हैं आस्तीन
मोड़े कमीजों की
झगड़े में है महुआ
डाल का चुआ।

किसी की भरी आंखें
जीभ ज्यों कतरनी है‚
किसी के तने तेवर
हाथ में सुमिरनी है‚
कैसा कैसा अपना
ख़ून है मुआ।

खट्टी–मीठी यादें
अधपके करौंदों की
हिस्से बटवारे में
खो गये घरौंदों की
बिच्छू सा आंगन
दालान ने छुआ।

पुस्तैनी रामायन
बंधी हुई बेठन में‚
अम्मां ज्यों जली हुई
रस्सी हैं ऐंठन में‚
बाबू पसरे जैसे
हारकर जुआ।

लीप रही है उखड़े
तुलसी के चौरे को‚
आया है द्वार का
पहआ भी कौरे को‚
साझे का है‚ भूखा
सो गया सुआ।

~ अमरनाथ श्रीवास्तव

 
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