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Posted on Feb 10, 2016 in Contemplation Poems, Life And Time Poems | 0 comments

फूल और कांटे – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

फूल और कांटे – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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Flower and thorns are products of the same plant but have such different characteristics. Being born to same parents does not ensure similar character. Here is a famous poem of Hariaudh Ji – Rajiv Krishna Saxena

हैं जनम लेते जगत में एक ही‚
एक ही पौधा उन्हें है पालता।
रात में उन पर चमकता चांद भी‚
एक ही–सी चांदनी है डालता।

मेह उन पर है बरसता एक–सा‚
एक–सी उन पर हवाएं हैं वहीं।
पर सदा ही यह दिखाता है समय‚
ढंग उनके एक–से होते नहीं।

छेद कर कांटा किसी की उंगलियां‚
फाड़ देता है किसी का वर वसन।
और प्यारी तितलियों का पर कतर‚
भौंर का है वेध देता श्याम तन।

फूल लेकर तितलियों को गोद में‚
भौंर को अपना अनूठा रस पिला।
निज सुगंधी औ’ निराले रंग से‚
है सदा देता कली दिल की खिला।

खटकता है एक सबकी आंख में‚
दूसरा है सोहता सुर सीस पर।
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे‚
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।

∼ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

 
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