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Posted on Dec 5, 2017 in Contemplation Poems, Frustration Poems | 0 comments

पता ही नहीं – कृष्ण बिहारी नूर

पता ही नहीं – कृष्ण बिहारी नूर

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Some sher by Krishna Bihari Noor, that define the truth of this life and world in such simple words! – Rajiv Krishna Saxena

जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

जिंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं

जिंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिस के कारण फसाद होते हैं
उसका कोई अता पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैगंबर
ऐसा लगता है अब खुदा ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतहा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
अइना झूठ बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो जिंदा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं

~ कृष्ण बिहारी ‘नूर’

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