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Posted on May 9, 2016 in Contemplation Poems, Life And Time Poems | 0 comments

परिवर्तन – ठाकुर गोपालशरण सिंह

परिवर्तन – ठाकुर गोपालशरण सिंह

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Change or parivartan they say, is the only that never stops. Everything changes as day follows night and night follows day. Everyone faces constant ups and downs. Here is a poem that makes a statement to this effect. Rajiv Krishna Saxena

देखो यह जग का परिवर्तन

जिन कलियों को खिलते देखा
मृदु मारुत में हिलते देखा
प्रिय मधुपों से मिलते देखा
हो गया उन्हीं का आज दलन
देखो यह जग का परिवर्तन

रहती थी नित्य बहार जहाँ
बहती थी रस की धार जहाँ
था सुषमा का संसार जहाँ
है वहाँ आज बस ऊजड़ बन
देखो यह जग का परिवर्तन

था अतुल विभव का वास जहाँ
था जीवन में मधुमास जहाँ
था सन्तत हास विलास जहाँ
है आज वहाँ दुख का क्रंदन
देखो यह जग का परिवर्तन

जो देश समुन्नत–भाल रहे
नित सुखी स्वतंत्र विशाल रहे
जन–मानस–मंजु–कराल रहे
लो उनका भी हो गया पतन
देखो यह जग का परिवर्तन

~ ठाकुर गोपालशरण सिंह

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