Pages Menu
Categories Menu

Posted on Dec 26, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

परम्परा – रामधारी सिंह दिनकर

परम्परा – रामधारी सिंह दिनकर

Introduction: See more

Tradition (parampara) is strong in India but the forces of post-modernism are chipping at it. Tradition may appear irrational but it provides the inner strength to a society. One is resigned to the fact that in due course of time, Indian society would give up its traditional ways. While this loss is inevitable, Dinkar here tells us that tradition holds a society together and is soothing to individuals…Rajiv Krishna Saxena

परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो
उसमें बहुत कुछ है
जो जीवित है
जीवन दायक है
जैसे भी हो
ध्वंस से बचा रखने लायक है

पानी का छिछला होकर
समतल में दौड़ना
यह क्रांति का नाम है
लेकिन घाट बांध कर
पानी को गहरा बनाना
यह परम्परा का नाम है

परम्परा और क्रांति में
संघर्ष चलने दो
आग लगी है, तो
सूखी डालों को जलने दो

मगर जो डालें
आज भी हरी हैं
उन पर तो तरस खाओ
मेरी एक बात तुम मान लो

लोगों की आस्था के आधार
टुट जाते है
उखड़े हुए पेड़ो के समान
वे अपनी जड़ों से छूट जाते है

परम्परा जब लुप्त होती है
सभ्यता अकेलेपन के
दर्द मे मरती है
कलमें लगना जानते हो
तो जरुर लगाओ
मगर ऐसी कि फलो में
अपनी मिट्टी का स्वाद रहे

और ये बात याद रहे
परम्परा चीनी नहीं मधु है
वह न तो हिन्दू है, ना मुस्लिम

~ रामधारी सिंह ‘दिनकर’

 
Classic View Home

1,982 total views, 1 views today

Post a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *