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Posted on Jan 4, 2016 in Bal Kavita, Contemplation Poems, Frustration Poems, Poor People Poems | 0 comments

कुम्हलाये हैं फूल – ठाकुर गोपाल शरण सिंह

कुम्हलाये हैं फूल – ठाकुर गोपाल शरण सिंह

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In this lovely poem, flowers are metaphors for children. Those children who do not have a childhood are like wilted flowers. Like the children I photographed recently in Delhi’s Sarojini Nagar Market, selling various sundry items to passers by. Rajiv Krishna Saxena

कुम्हलाये हैं फूल

अभी–अभी तो खिल आये थे
कुछ ही विकसित हो पाये थे
वायु कहां से आकर इन पर
डाल गयी है धूल
कुम्हलाये हैं फूल

जीवन की सुख–घड़ी न पायी
भेंट न भ्रमरों से हो पायी
निठुर–नियति कोमल शरीर में
हूल गयी है शूल
कुम्हलाये हैं फूल

नहीं विश्व की पीड़ा जानी
निज छवि देख हुए अभिमानी
हँसमुख ही रह गये सदा ये
वही एक थी भूल
कुम्हलाये हैं फूल

∼ ठाकुर गोपाल शरण सिंह

 
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