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Posted on Jan 4, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

कोई और छाँव देखेंगे – ताराप्रकाश जोशी

कोई और छाँव देखेंगे – ताराप्रकाश जोशी

Introduction: See more

We often feel that this life was just a learning experience and if only we could do it again with the accumulated wisdom. At time we feel dejected at the contorted and unfair ways of the world. If only we could run away and find a better place… This poem of Taraprakash Joshi depicts the feeling very well. Rajiv Krishna Saxena

कोई और छाँव देखेंगे।
लाभ घाटों की नगरी तज
चल दे और गाँव देखेंगे।

सुबह सुबह के सपने लेकर
हाटों हाटों खाए फेरे।
ज्यों कोई भोला बनजारा
पहुचे कहीं ठगों के डेरे।
इस मंडी में ओछे सौदे
कोई और भाव देखेंगे।

भरी दुपहरी गाँठ गँवाई
जिससे पूछा बात बनाई।
जैसी किसी ग्रामवासी की
महा नगर ने हँसी उड़ाई।
ठौर ठिकाने विष के दागे
कोई और ठाँव देखेंगे।

दिन ढल गया उठ गया मेला
खाली रहा उम्र का ठेला।
ज्यों पुतलीघर के पर्दे पर
खेला रह जाए अनखेला।
हार गए यह जनम जुए में
कोई और दाँव देखेंगे।

किसे बतयें इतनी पीड़ा
किसने मन आँगन में बोई।
मोती के व्यापारी को क्या
सीप उम्रभर कितना रोई।
मन के गोताखोर मिलेंगे
कोई और नाव देखेंगे।

~ ताराप्रकाश जोशी

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