Pages Menu
TwitterRssFacebook
Categories Menu

Posted on Jan 25, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems, Poor People Poems | 0 comments

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये – दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये – दुष्यंत कुमार

Introduction: See more

After India attained independence in 1947, people had high hopes and looked forward to better their lives under the self-rule. These hopes were however shattered in coming decades and an all out frustration gripped the society. Dushyant Kumar died in 1975 (at a young age of 52). He sensed the frustration first hand and his work beautifully captured the mood of people in that era of losing hopes – Rajiv Krishna Saxena

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये,
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये।

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये।

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये।

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये।

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये।

∼ दुष्यंत कुमार

मयस्सर ∼ उपलब्ध
मुतमईन ∼ संतुष्ट
मुनासिब ∼ ठीक

Classic View Home

2,800 total views, 1 views today

Post a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *