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Posted on Apr 24, 2017 in Contemplation Poems, Life And Time Poems | 0 comments

जिंदगी बदल रही है – गुलज़ार

जिंदगी बदल रही है – गुलज़ार

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In early summer, fields are empty and dried leaves fallen from trees fly all over in warm wind. Poet presents a shabda-chitra and likens the scene to the loneliness in life. Rajiv Krishna Saxena

जब मैं छोटा था
दुनियाँ शायद बहुत बड़ी हुआ करती थी,
मुझे याद है, मेरे घर से स्कूल तक का वह रस्ता,
क्या–क्या नहीं था वहाँ,
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बरफ के गोले,
सब कुछ!

अब वहाँ मोबाइल शॉप, विडियो पार्लर हैं
फिर भी सब सूना है,
शायद दुनियाँ अब सिमट रही हैं।

जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लंबी हुआ करती थीं,
मैं हाथ में पतंग की डोर लिये घंटों उड़ा करता था,
वो लंबी सइकिल रेस,
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक कर चूर हो जाना।

अब शाम नहीं होती,
दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है,
शायद वक्त सिमट रहा है।

जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ूम बना कर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो लड़कियों की बातें,
वो साथ में रोना,

अब भी कई दोस्त है पर दोस्ती जाने कहाँ हैं,
जब भी ट्रैफिक सिगनल पर मिलते हैं
हाई हो जाती है,
औ अपने–अपने रस्ते चल देते हैं।
होली दिवली न्यू इयर पर बस एस एम एस आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहे हैं।

जब मैं छोटा था,
खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपम छुपाई, लंगड़ी टांग, टिप्पी टिप्पी टाप,
और अब इंटरनेट, आफिस से फुरसत ही नहीं मिलती,
शायद जिंदगी बदल रही है।

जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है,
जो कब्रिस्तान के बाहर बोर्ड पर लिखा होता है
मंजिल तो यही थी,
बस जिंदगी गुज़र गई मेरी यहाँ आते आते,

जिंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है,
कल की कोई बुनियाद नहीं है,
और आने वाला कल सिर्फ सपने में है।

अब बच गए इस पल में,
तमन्नओं से भरी इस जिंदगी में,
हम सिर्फ भाग रहे हैं।

कुछ रफ्तार धीमी करो मेरे दोस्त,
और इस जिंदगी को जियो,
खूब जियो।

~ गुलज़ार

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