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Posted on Jan 25, 2016 in Contemplation Poems, Life And Time Poems, Poor People Poems | 0 comments

जाहिल मेरे बाने – भवानी प्रसाद मिश्र

जाहिल मेरे बाने – भवानी प्रसाद मिश्र

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Our farmers are deeply attached to soil. They follow the rustic tradition and perpetuate the ancient ways. They grow food for all and sustain the humanity. Here is a lovely satire by Bhawani Prasad Mishra Ji on the “civilized” city-dwellers who call these farmers uncivilized. Rajiv Krishna Saxena

मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पाँवों चलता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि चीरकर धरती धान उगाता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूँ

आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर
आप सभ्य हैं क्योंकि धान से भरी आपकी कोठी
आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ पाते हैं पोथी
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं
आप सभ्य हैं क्योंकि जबड़े ख़ून सने हैं

आप बड़े चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे
आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढँग हमारे
मैं उतारना नहीं चाहता जाहिल अपने बाने
धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटाए हूँ याने!

∼ भवानी प्रसाद मिश्र

शब्दार्थ:
बाने ∼ वस्त्र

 
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