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Posted on Feb 2, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

धुंधली नदी में – धर्मवीर भारती

धुंधली नदी में – धर्मवीर भारती

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Some times we look at the world just as an observer. We see all the colors, beauty and joy, but just as an outside observer and not as a participant. There is an acute sense of loneliness, as if nothing belongs to us. Here is how Dharamvir Bharati Ji conveys the feelings. Rajiv Krishna Saxena

आज मैं भी नहीं अकेला हूं
शाम है‚ दर्द है‚ उदासी है।

एक खामोश सांझ–तारा है
दूर छूटा हुआ किनारा है
इन सबों से बड़ा सहारा है।

एक धुंधली अथाह नदिया है
और भटकी हुई दिशा सी है।

नाव को मुक्त छोड़ देने में
और पतवार तोड़ देने में
एक अज्ञात मोड़ लेने में
क्या अजब–सी‚ निराशा–सी‚
सुख–प्रद‚ एक आधारहीनता–सी है।

प्यार की बात ही नहीं साथी
हर लहर साथ–साथ ले आती
प्यास ऐसी कि बुझ नहीं पाती
और यह जिंदगी किसी सुंदर
चित्र में रंगलिखी सुरा–सी है।

आज मैं भी नहीं अकेला हूं
शाम है‚ दर्द है‚ उदासी है।

∼ धर्मवीर भारती

 
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