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Posted on Oct 20, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

बीत गया इतवार – माहेश्वर तिवारी

बीत गया इतवार – माहेश्वर तिवारी

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We promise ourselves that we shall finish such and such work over the weekend. After all, who has the time during working week days? Chores just pile up for the week end. But the weekend comes and goes while we procrastinate and just waste time. Rajiv Krishna Saxena

सारे दिन पढ़ते अख़बार;
बीत गया है फिर इतवार।

गमलों में पड़ा नहीं पानी
पढ़ी नहीं गई संत-वाणी
दिन गुज़रा बिलकुल बेकार
सारे दिन पढ़ते अख़बार।

पुँछी नहीं पत्रों की गर्द
खिड़की-दरवाज़े बेपर्द
कोशिश करते कितनी बार
सारे दिन पढ़ते अख़बार।

मुन्ने का तुतलाता गीत-
अनसुना गया बिल्कुल बीत
कई बार करके स्वीकार
सारे दिन पढ़ते अख़बार
बीत गया है फिर इतवार।

∼ माहेश्वर तिवारी

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