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Posted on Sep 8, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

अब तो पथ यही है – दुष्यन्त कुमार

अब तो पथ यही है – दुष्यन्त कुमार

[Sooner or later, we all compromise in life. Sooner or later, idealism gives way to realism. Here is a beautiful poem of Dushyant Kumar Ji – Rajiv Krishna Saxena]

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार‚
अब तो पथ यही है।

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है‚
एक हलका सा धुंधलका था कहीं‚ कम हो चला है‚
यह शिला पिघले न पिघले‚ रास्ता नम हो चला है‚
क्यों करूं आकाश की मनुहार‚
अब तो पथ यही है।

क्या भरोसा‚ कांच का घट है‚ किसी दिन फूट जाए‚
एक मामूली कहानी है‚ अधूरी छूट जाए‚
एक समझौता हुआ था रौशनी से‚ टूट जाए‚
आज हर नक्षत्र है अनुदार‚
अब तो पथ यही है।

यह लड़ाई‚ जो कि अपने आप से मैंने लड़ी है‚
यह घुटन‚ यह यातना‚ केवल किताबों में पढ़ी है‚
यह पहाड़ी पांव क्या चढ़ते‚ इरादों ने चढ़ी है‚
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार‚
अब तो पथ यही है।

∼ दुष्यन्त कुमार

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