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Posted on Sep 7, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

आओ कुछ राहत दें – दिनेश मिश्र

आओ कुछ राहत दें – दिनेश मिश्र

[Here is some philosophy of life from Dinesh Mishra. Third stanza shows how we unnecessarily get scared at times. Last stanza is my favorite. We accumulate so much experience through out the life, but the life ends before we get to test what we have learnt – Rajiv Krishna Saxena]

[ads1]आओ कुछ राहत दें इस क्षण की पीड़ा को
क्योंकि नये युग की तो बात बड़ी होती है‚
अपने हैं लोग यहां बैठो कुछ बात करो
मुश्किल से ही नसीब ऐसी घड़ी होती है।

दर्द से लड़ाई की कांटों से भरी उगर
एक शुरुआत करें आज रहे ध्यान मगर‚
झूठे पैंगंबर तो मौज किया करते हैं
ईसा के हाथों में कील गड़ी होती है।

हमराही हिम्मत से बीहड़ को पार करो
आहों के सौदागर तबकों पर वार करो‚
जिनको हम शेर समझ डर जाया करते हैं
अक्सर तो भूसे पर ख़ाल मढ़ी होती है।

संकल्पों और लक्ष्य बीच बड़ी दूरी है
मन है मजबूर मगर कैसी मजबूरी है‚
जब तक हम जीवन की गुत्थी को सुलझायें
अपनी अगवानी में मौत खड़ी होती है।

— दिनेश मिश्र

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