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Posted on Aug 26, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems | 0 comments

आदमी का आकाश – राम अवतार त्यागी

आदमी का आकाश – राम अवतार त्यागी

[We are in the midst of major social changes. As personal concerns take primacy over social concerns, families shrink from joint to nuclear, communications shrink, children go far away leaving parents alone in old age and selfishness replaces warm hearts, the pleasures of life too have shrunk considerably (see the last line of the poem). Rajiv Krishna Saxena]

भूमि के विस्तार में बेशक कमी आई नहीं है
आदमी का आजकल आकाश छोटा हो गया है।

हो गए सम्बन्ध सीमित डाक से आए ख़तों तक
और सीमाएं सिकुड़ कर आ गईं घर की छतों तक
प्यार करने का तरीका तो वही युग–युग पुराना
आज लेकिन व्यक्ति का विश्वास छोटा हो गया है।

आदमी की शोर से आवाज़ नापी जा रही है
घंटियों से वक़्त की परवाज़ नापी जा रही है
देश के भूगोल में कोई बदल आया नहीं है
हाँ हृदय का आजकल इतिहास छोटा हो गया है।

यह मुझे समझा दिया है उस महाजन की बही ने
साल में होते नहीं हैं आजकल बारह महीने
और ऋतुओं के समय में बाल भर अंतर न आया
पर न जाने किस तरह मधुमास छोटा हो गया है।

∼ राम अवतार त्यागी

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