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Posted on Jan 22, 2016 in Bal Kavita, Inspirational Poems, Rain Poems | 1 comment

एक बूंद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक बूंद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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Here is the story of a rain drop, apprehensive and scared of being destroyed. Instead, it falls into a seepi and turns in a pearl. A simple, effective and moving poem that assuages the fear of unknown in us when we embark in a new activity or start a new phase of life, and gives us hope. Rajiv Krishna Saxena

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर फिर यही मन में लगी
आह क्यों घर छोड़ कर मैं यों बढ़ी।

दैव मेरे भाग्य में है क्या बदा
मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में
या जलूंगी गिर अंगारे पर किसी
चू पड़ूंगी या कमल के फूल में।

बह गई उस काल कुछ ऐसी हवा
वह समुंदर ओर आई अनमनी
एक सुंदर सीप का मुंह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।

लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किंतु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूंद लौं कुछ ओर ही देता है कर।

∼ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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1 Comment

  1. Pls is kabita Pura bakhya batai

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